असली ब्राह्मण को न है

आज हम चर्च करेंगे कि हमारे पवित्र शास्त्रों के आधार पर ओर जानेंगे को न है असली ब्राह्मण कोंन 

-----------------  श्री ब्राह्मण वह है जो परमात्मा को पहचानता है। उसकी पूरी जानकारी तथा तत्वज्ञान की पूरी जानकारी
हमारे शास्त्रों से आधार पर 
ब्रह्म सत्य, जगत मिथ्या : जो ब्रह्म (ईश्वर) को छोड़कर किसी अन्य को नहीं पूजता वह ब्राह्मण। ब्रह्म को जानने वाला ब्राह्मण कहलाता है। कहते हैं कि जो पुरोहिताई करके अपनी जीविका चलाता है, वह ब्राह्मण नहीं, याचक है। जो ज्योतिषी या नक्षत्र विद्या से अपनी जीविका चलाता है वह ब्राह्मण नहीं, ज्योतिषी है और जो कथा बांचता है वह ब्राह्मण नहीं कथा वाचक है। इस तरह वेद और ब्रह्म को छोड़कर जो कुछ भी कर्म करता है वह ब्राह्मण नहीं है। जिसके मुख से ब्रह्म शब्द का उच्चारण नहीं होता रहता वह ब्राह्मण नहीं।
शराब पीकर, मांस खाकर और असत्य वचन बोलकर भी खुद कोई ब्राह्मण नहीं कह सकता हैं। धर्म के बारे में पूर्ण जानकारी नहीं रखकर, धर्म के बारे में मनमानी बाते बोलकर या धर्मविरोधी वचन बोलकर खुद को ब्राह्मण कहने वाले ब्राह्मण नहीं हो सकते। 
वो काल भगवान स्वयं कह रहा की अर्जून

श्रीमद् देवी भागवत  स्कंद ६, पृष्ठ ४१४, गीताप्रेस गोरखपुर से प्रकाशित ग्रंथ मे जनमेजय द्वारा 4 युगों मे धर्म की स्थिति से संबंधित प्रश्न मे जो व्यास जी से पुछा उसमे बताया गया है कि जिन्हें पिछले युगों सतयुग, त्रेता, द्वापर में राक्षस माना जाता था, उन्हें कलयुग (वर्तमान युग) में ब्राह्मण माना जाता है।

गीता जी अनुसार 


वे हमेशा सभी को धोखा देने और अपने अनुयायियों के लिए झूठी व पाखंड पूजाओं  को पक्षपोषित करने के लिए आतुर रहते हैं, जो वेदों के अनुकूल नहीं यानि शास्त्र विरुद्ध है।

जगतगुरु तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज अपने सत्संग में ब्राह्मण की पहचान को प्रमाणित करके बताते हैं

ब्राह्मण सोए, जो ब्रह्म  पहचाने

 अर्थात

असली ब्राह्मण वही है जो पूर्ण ब्रह्म को समाज़ में प्रचलित कथाओ से ना पहचानकर धर्मग्रन्थो के आधार पर पहचाने और शस्त्रअनुकूल भक्ति पद्धति का ही अनुसरण करे और कराये।

इस मूल तथ्य को,परमात्मा और धर्म की स्थिति की वास्तविकता को असंख्य धरमगरुओ के विस्तार के बीच सदग्रंथो के यथार्थ ज्ञान से उजागर केवल तत्वादर्शी संत रामपाल जी महाराज ही कर सके है।


 निष्कर्ष

"श्रीमद् देवी भागवत पुराण" जैसा बड़ा प्रमाण समाज के सामने होने के बाद ब्राह्मणों की स्थिति के बारे में  कुछ कहने को बाकी नहीं रह जाता, जिसमें साफ तौर पर उनकी कलियुगी मानसिकता उस समय से प्रचलित रही जब किसी भी धर्म का सत्यापन नहीं हुआ था, क्योंकि इन पंडितों, ब्राह्मणों, विद्वानों ने सनातन धर्म के समय ही मूर्ति उपासना को प्रचलित कर दिया जबकि देवी दुर्गा स्वयं अन्य भगवान की पूजा की तरफ संकेत करती हैं।


पवित्र श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 16  श्लोक 23, 24 में  मूर्ति पूजा शास्त्र विरुद्ध आचरण होने के कारण मनमाना आचरण बतायी गयी है ।

अतः भक्त समाज के लिये ये बेहद जरूरी हो जाता है कि वो पंडितों द्वारा बतायी गयी दंतकथा पर नहीं सदग्रंथो में वर्णित सत्यकथा को प्रमाण आधार से समझें ताकि पाखंडवाद के भयंकर दुष्परिणामों से बचकर पूर्ण ब्रह्म की प्राप्ति कर सके और मानव जीवन का कल्याण सुनिश्चित हो ।

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